बाप न्यूज | हैल्थ डेस्क राजस्थान का मरुस्थलीय इलाका अपनी तपती रेत, तेज हवाओं और सीमित पानी के लिए जाना जाता है। ऐसे कठिन वातावरण में जहां...
बाप न्यूज | हैल्थ डेस्क
राजस्थान का मरुस्थलीय इलाका अपनी तपती रेत, तेज हवाओं और सीमित पानी के लिए जाना जाता है। ऐसे कठिन वातावरण में जहां सामान्य पौधों का जीवित रहना भी चुनौती माना जाता है, वहीं कुछ देशज वनस्पतियां वर्षों से प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। इन्हीं में से एक है केर, जो पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण जीवन, खान-पान और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
केर को स्थानीय भाषा में इसी नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Capparis decidua है। यह कांटेदार झाड़ी या छोटे पेड़ के रूप में दिखाई देता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे पनपने के लिए ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती। गर्मी, सूखा और रेतीली जमीन जैसी परिस्थितियों में भी केर आसानी से अपना जीवन चक्र पूरा कर लेता है। यही कारण है कि मरुस्थलीय क्षेत्र में इसे प्रकृति का अनमोल उपहार माना जाता है।
केर की शाखाएं हरी और पतली होती हैं तथा इसकी पत्तियां बहुत छोटी होती हैं। पौधे पर छोटे फूल आने के बाद गोल आकार के फल लगते हैं। शुरुआत में ये फल हरे दिखाई देते हैं और पकने के साथ इनका रंग बदलने लगता है। ग्रामीण क्षेत्रों में केर के कच्चे फलों को विशेष रूप से उपयोग में लिया जाता है।
राजस्थान के पारंपरिक खान-पान में केर का अपना अलग स्थान है। केर-सांगरी का नाम आते ही राजस्थान के पारंपरिक स्वाद की तस्वीर सामने आ जाती है। केर को सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। पकाने से पहले इसे पानी में भिगोकर या आवश्यकतानुसार उपचारित किया जाता है, जिससे इसकी प्राकृतिक कड़वाहट और कसैलापन कम हो जाता है। इसके बाद मसालों के साथ तैयार की गई केर की सब्जी ग्रामीण रसोई के खास व्यंजनों में शामिल होती है।
केर केवल भोजन तक सीमित नहीं है। मरुस्थलीय पारिस्थितिकी में भी इसका महत्व है। कम पानी में जीवित रहने की क्षमता के कारण यह उन वनस्पतियों में शामिल है, जो शुष्क वातावरण में हरियाली बनाए रखने में योगदान देती हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में केर लंबे समय से स्थानीय लोगों की खाद्य परंपरा और जीवनशैली से जुड़ा रहा है।
आज जब पारंपरिक खाद्य पदार्थों और देशज वनस्पतियों को लेकर लोगों की रुचि बढ़ रही है, केर की उपयोगिता भी नए सिरे से सामने आ रही है। पश्चिमी राजस्थान में प्राकृतिक रूप से मिलने वाला यह छोटा सा फल अपने भीतर रेगिस्तान की पूरी कहानी समेटे हुए है - कम संसाधनों में जीवन, कठिन परिस्थितियों में संघर्ष और परंपरा से जुड़ा स्वाद।
तपती रेत के बीच उगने वाला केर इस बात का उदाहरण है कि प्रकृति ने मरुस्थल को भी अपने अनोखे संसाधनों से समृद्ध बनाया है। राजस्थान की पहचान केवल उसके किलों, हवेलियों और लोक संस्कृति से नहीं, बल्कि ऐसी देशज वनस्पतियों से भी है, जो सदियों से यहां के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं। केर उन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में से एक है, जिसे संरक्षित करना आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जरूरी है।

