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जैसे जैसे खोती जा रही रीत, वैसे वैसे याद आ रही रीत

Article: वह प्रीत भरी रीत ...हमारे पूर्वजों ने भूख को प्यास से मिटाकर बनाई , अभाव को प्रीत के भाव से सींच कर बनाई, साधनों की दैन्यता को परस्...

Article: वह प्रीत भरी रीत...हमारे पूर्वजों ने भूख को प्यास से मिटाकर बनाई , अभाव को प्रीत के भाव से सींच कर बनाई, साधनों की दैन्यता को परस्पर सहयोगी जीवन जीकर बनाई, उष्ण लू के लपकों और काळी-पीळी धूलभरी छर्रेदार आँधियों को झेलकर बनाई, अकालों की कालिमा और आपदाओं-विपदाओं की कालरात्रि को जीवटता से जीकर बनाई, सुखों को तजकर, संघर्षों पर तपकर और अरमानों को जलाकर बनाई..। वह रीत आज याद आती है। वह रीत प्रीत की थी।

बचपन की यादगार रीत...होली की छुट्टियों के बाद सबसे ज्यादा इंतज़ार वाली यह रीत, प्रतीक्षा को पंख लगाती रीत..पन्द्रह दिन पहले ही रात भर खेलना, रात भर टोकरों की प्राणाकर्षण टँकार.. रात पर भारी मन भावन खेल, बेलियों का साथ, मजाकों और हँसी को सहलाती वे मनभाती लुभाती बातें ..सारा बचपन एक ही रेतीले टीले पर...मस्ती,अल्हड़पन और बेफिक्री खुद को जैसे जी उठती। आज सोचता हूँ...असली धन (वे नि:स्वार्थ बेली,मित्र) और अमीरी ( वे मस्ती भरे दिन और उमंग भरी रातें) तो बहुत पीछे छोड़ आया। अब तो महज दिमागी तस्वीरों को बेरंग ढो रहा हूँ।
वह रीत बचपन की याद आती है।

सुनो वह रीत यही आखातीज... अनूठी रीत और बेजोड़ भी। प्रत्येक घर-गाँव में एक ही भोजन ; बिना विषमता के ऊँच-नीच का उन्मूलन ; एक ही जाजम पर समूची बस्ती का भोजन...थालियाँ भर कर...खीच,गळवानी और ग्वार फळी का साग..चेहरों पर मुस्कान लिए टाबर, चेहरे पर अनुभवों और संघर्षों की गाथा लिए दाढ़ीदार बुजुर्ग, काल के कपाल पर सुकाल को हळ से लिखने वाले हळिये..अभावों, विपन्नता,दैन्यता का मद चूर करने वाले अनमी युवा और सामूहिक सामाजिक जीवन को साकार आकार देती..आखातीज।
वह रीत आज कितनी याद आती है..!!

खुशहाली को खोजती वह रीत....प्रभात काल का सुन्दर चितेरा बना ब्रह्म- मुहूर्त.. आज आखातीज पर ठण्डी बयार की बहार ने प्यार से छूकर हमें जल्दी जगाया है। हाँ,अब सभी के घरों के आगे हल चलाकर खुशहाली का प्रतिकात्मक हल खोजना है। पशु,पक्षी भी कलरव करते शुभकामनाएँ दे रहे हैं और मन्दिर -थान- स्मारक-छतरियाँ आशीर्वाद..।
देखो ! एक जाति का हल खींच रहा है तो दूसरे वर्ग वाला बीजण( बीज बो रहा) कर रहा ,कोई भेद नहीं, हर घर के आगे बराबर का हकी हळोत..सभी के लिए खुशहाली की कामना।
पवित्र मन , सर्वजनहिताय और निश्छल सोच वाली वह कुटुम्ब को जीती रीत कितनी वैज्ञानिक, समता,प्रेम और सामीप्य वाली रही है।
वह रीत आज खूब याद आती है।

रीत भूलाती रीतें...आधुनिकता का छाया कोहरा,अन्तहीन आवश्यकताएँ, होड़ की दौड़ में बेतहाशा भागती हताश जिन्दगी, दूषित संस्कृतियों को अपनाता वर्तमान, मानक विचारों को खोता युवा, डाह और दम्भ को सींचती व्यवस्था, अतीत को भूलती पीढी़...।
ऐसी रीतियाँ, जो पुरातन रीतों को खाए और खोए जा रही हैं।
जैसे-जैसे रीत खोती जा रही है,वैसे-वैसे रीत याद आती जा रही है।
बन्धु !! आपको भी रीत याद आई न..!!!

( प्रताप सिंह टेपू 'एडवोकेट' की कलम से)

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