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पश्चिमी राजस्थान में कोरोना के बाद रेगिस्तानी टिड्डियां किसानों की मुख्य समस्या- डाॅ. नागल

Bap New s:  फलोदी में मोहरा गांव रोड पर स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डाॅ. सेवाराम कुमावत ने बताया कि वर्तमान ...

Bap News: फलोदी में मोहरा गांव रोड पर स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डाॅ. सेवाराम कुमावत ने बताया कि वर्तमान में जोधपुर जिले में टिड्डी दल का प्रकोप खतरनाक माना जा रहा है। जो कि धीरे-धीरे राजस्थान सहित भारत के अन्य राज्यों तक फैल चुका है। यह टिड्डी दल हमेशा हवा की दिशा में ही उडान भरता है। जोधपुर जिला कोरोना के बाद अब टिड्डी कहर में भी होट-स्पोट बन चुका है।
मानसून पुर्व की बारिश से होने वाली बीजाई और हरियाली इन टिड्डी दलों को खुब लुभाती है। केन्द्र के कीट विशेषज्ञ डाॅ. गजानन्द नागल ने बताया कि टिड्डी की तीन अवस्थाएं होती है- अण्डा, शिशु (फाका) तथा प्रौढ़। इस कीट की एक व्यस्क मादा नम रेतीली मिट्टी में लगभग 40-120 अण्डे देती है। अण्डों से फाका सामान्य तापमान एवं नमी की उपलब्धि के अनुसार 10-30 दिनों में निकलते हैं। फाका अवस्था का रंग काला-भूरा होता है। फाका से प्रौढ़ बनने में गर्मियों के दिनों में 20-25 दिन का समय लगता है, जिसमें फाका 5 अवस्थाओं से होकर गुजरता है- सामान्य जन कालिया फाका, छोटा कावरिया फाका, बड़ा कावरिया फाका, छोटा पीला फाका व बड़ा पीला फाका। 
गर्मियों के दिनों में प्रौढ़ टिड्डीयों का रंग चमकदार पीला होता है। ये टिड्डियां सभी तरह की वनस्पतियों को खाकर नुकसान पहुंचाती हैं। कुछ मिनट या घण्टे के अन्दर ही हरी-भरी फसल व पेड़ों को पत्ती रहित शाखाओं के रूप में परिवर्तित कर देती हैं। टिड्डी दल से होने वाले नुकसान से बचने हेतु खेतों में जगह-जगह आग जलाकर धुआं करे, बर्तन बजाये या ट्रेक्टर
द्वारा आवाज करके खेतों में न बैठने दे। फसलों तथा खेत में उपस्थित अन्य वृक्षों को टिड्डी दल से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए क्लोरपाइरिफोस 20 ई.सी (2.4 मि.ली./ली.) अथवा क्लोरपाइरिफोस 50 ई.सी (1 मि.ली./ली.) अथवा डेल्टामेथ्रीन 2.8 ई.सी. (1 मि.ली./ली.) अथवा फिप्रोनिल 5 एस.सी. (0.25 मि.ली./ली.) अथवा लेम्बडासाइहेलोथ्रीन 5 ई.सी. (1 मि.ली./ली.) का छिड़काव करें।

फलोदी से अशोक कुमार मेघवाल की रिपोर्ट

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